एक नाटक ने बदली जिंदगी: पत्रकारिता से अभिनय की ओर मुड़ीं सुरेखा सीकरी की कहानी

मुंबई, 15 जुलाई । हिंदी सिनेमा, टेलीविजन और रंगमंच की दुनिया में अलग पहचान बनाने वाली दिग्गज अभिनेत्री सुरेखा सीकरी को गुजरे हुए कई साल हो चुके हैं, लेकिन उनके निभाए किरदार आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदा हैं। सख्त 'दादी सा' से लेकर संवेदनशील मां और मजबूत महिला के किरदार तक, उन्होंने हर भूमिका में जान डाल दी।

दिलचस्प बात यह है कि अभिनय की दुनिया में आने से पहले सुरेखा सीकरी पत्रकार बनने का सपना देखती थीं, लेकिन किस्मत उन्हें रंगमंच की दुनिया में ले गई और आगे चलकर उन्होंने अभिनय को ही अपनी पहचान बना लिया।

सुरेखा सीकरी का जन्म 19 अप्रैल 1945 को नई दिल्ली में हुआ था। उनका बचपन अल्मोड़ा और नैनीताल में बीता। पढ़ाई में वह काफी अच्छी थीं और शुरुआत में उनका सपना पत्रकार बनने का था। हालांकि, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान उनकी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया। इसी दौरान उन्होंने रंगमंच को करीब से जाना और अभिनय की तरफ उनका झुकाव बढ़ने लगा।

कहा जाता है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में मशहूर रंगकर्मी इब्राहिम अल्काजी के नाटक ने सुरेखा सीकरी के मन पर गहरा असर डाला। उनकी बहन भी इस नाटक से प्रभावित हुई थीं और अभिनय की दुनिया में जाने का विचार किया था। बाद में सुरेखा ने खुद नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) का फॉर्म भरा और उनका चयन हो गया। साल 1968 में वह अभिनय सीखने के लिए दिल्ली पहुंचीं और 1971 में उन्होंने एनएसडी से पढ़ाई पूरी की।

एनएसडी से निकलने के बाद सुरेखा सीकरी ने कई साल तक थिएटर में काम किया। उन्होंने एनएसडी रिपर्टरी कंपनी के साथ लंबे समय तक रंगमंच किया और कई यादगार नाटकों में अभिनय किया। थिएटर ने उनके अभिनय को गहराई दी, और यही अनुभव आगे चलकर फिल्मों और टेलीविजन में उनके काम आया। साल 1989 में उन्हें रंगमंच में योगदान के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

सुरेखा सीकरी ने साल 1977 में 'किस्सा कुर्सी का' से बॉलीवुड में कदम रखा। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में सहायक भूमिकाएं निभाईं, लेकिन हर किरदार को अपनी खास शैली से यादगार बना दिया। गोविंद निहलानी की फिल्म 'तमस', श्याम बेनेगल की 'मम्मो', 'सरफरोश', 'जुबेदा', 'रेनकोट' और कई अन्य फिल्मों में उनके अभिनय की खूब तारीफ हुई।

साल 1988 में आई फिल्म 'तमस' और 1995 की फिल्म 'मम्मो' के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसके बाद साल 2018 में आई फिल्म 'बधाई हो' ने उन्हें नई पीढ़ी के दर्शकों तक पहुंचाया। फिल्म में उन्होंने दुर्गा देवी कौशिक यानी आयुष्मान खुराना की दादी का किरदार निभाया था। इस भूमिका के लिए उन्हें तीसरी बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें फिल्मफेयर और स्क्रीन अवॉर्ड भी मिले।

हालांकि, सुरेखा सीकरी को घर-घर पहचान टीवी सीरियल 'बालिका वधू' से मिली। इस शो में उन्होंने कल्याणी देवी यानी 'दादी सा' का किरदार निभाया था। लोग उन्हें उनके असली नाम से ज्यादा 'दादी सा' के नाम से पहचानने लगे। उनके डायलॉग बोलने का तरीका और चेहरे के एक्सप्रेशन इस किरदार की सबसे बड़ी ताकत थे।

सुरेखा सीकरी ने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव भी देखे। साल 2018 में उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ था, जिसके बाद उनकी सेहत पर असर पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी और काम करने की इच्छा बनाए रखी। उन्होंने हमेशा कहा कि वह अभिनय से दूर नहीं होना चाहतीं और सम्मान के साथ काम करना चाहती हैं।

उनकी आखिरी फिल्मों में 'घोस्ट स्टोरीज' और 'क्या मेरी सोनम गुप्ता बेवफा है?' शामिल रहीं। 16 जुलाई 2021 को मुंबई में कार्डियक अरेस्ट के कारण 76 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

Source: IANS

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