मिथिला मखाना से चांदी तरकाशी तक, भारत की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान दे रहे पूर्वी और मध्य भारत के 'जीआई' उत्पाद

नई दिल्ली, 26 मई । भारत की असली पहचान उसकी विविधता, परंपराओं और स्थानीय उत्पादों में बसती है। देश के अलग-अलग राज्यों में सदियों से तैयार हो रहे पारंपरिक उत्पाद आज दुनिया भर में अपनी अलग छाप छोड़ रहे हैं। इन उत्पादों को मिलने वाला जीआई टैग यानी ‘जियोग्राफिकल इंडिकेशन’ न केवल उनकी विशिष्ट पहचान को सुरक्षित करता है, बल्कि स्थानीय किसानों, बुनकरों और कारीगरों की मेहनत को वैश्विक मंच तक पहुंचाने का काम भी करता है।

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेश यात्रा के दौरान कई भारतीय पारंपरिक उत्पाद विदेशी नेताओं को उपहार स्वरूप भेंट किए। इनमें जयपुर की ब्लू पॉटरी, मीनाकारी-कुंदन कला, मिथिला मखाना और ओडिशा की रूपा तारकासी (चांदी की फिलिग्री कला) जैसे उत्पाद शामिल थे। इससे एक बार फिर भारतीय जीआई उत्पादों की वैश्विक पहचान मजबूत हुई।

भारत में 600 से अधिक उत्पादों को जीआई टैग मिल चुका है। इनमें पूर्वी और मध्य भारत के राज्यों का योगदान बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। देश के अन्य राज्यों के साथ ही बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के पारंपरिक उत्पाद आज देश की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बन चुके हैं।

जीआई टैग केवल किसी उत्पाद को पहचान देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का बड़ा माध्यम भी बन चुका है। इससे स्थानीय कारीगरों और किसानों को बेहतर बाजार मिलता है और नकली उत्पादों पर भी रोक लगती है।

आज जब दुनिया पारंपरिक, प्राकृतिक और हस्तनिर्मित उत्पादों की ओर आकर्षित हो रही है, तब पूर्वी और मध्य भारत के ये जीआई उत्पाद भारत की सांस्कृतिक ताकत और विविधता को वैश्विक मंच पर नई पहचान दे रहे हैं। गांवों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच चुके ये उत्पाद देश की विरासत और मेहनतकश लोगों की कला का जीवंत प्रतीक बन चुके हैं।

बिहार के कई उत्पाद अपनी गुणवत्ता और पारंपरिक स्वाद के लिए प्रसिद्ध हैं। मुजफ्फरपुर की शाही लीची अपनी मिठास और सुगंध के कारण देश-विदेश में पसंद की जाती है। मिथिला मखाना अब सुपरफूड के रूप में वैश्विक बाजार में पहचान बना चुका है। नालंदा का सिलाव खाजा अपनी कुरकुरी परतों के लिए मशहूर है, जबकि मगही पान और भागलपुर का कतरनी चावल अपनी विशेष खुशबू के कारण लोगों की पसंद बने हुए हैं।

बिहार केवल खाद्य उत्पादों तक सीमित नहीं है। भागलपुरी सिल्क, सिक्की घास से बने हस्तशिल्प, सुजनी कला और मंजूषा कला जैसी पारंपरिक कलाएं राज्य की सांस्कृतिक समृद्धि को दुनिया के सामने पेश करती हैं।

झारखंड की पहचान भी उसके पारंपरिक हस्तशिल्प और प्राकृतिक उत्पादों से जुड़ी हुई है। सरायकेला-खरसावां का टसर सिल्क और कुचाई हल्दी विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। वहीं, रांची और आसपास के क्षेत्रों में तैयार होने वाले जनजातीय आभूषण और बांस शिल्प स्थानीय कला का शानदार उदाहरण माने जाते हैं। देवघर का अट्ठे मटन और सिमडेगा की मीठी इमली भी क्षेत्रीय पहचान को मजबूत करते हैं।

ओडिशा की कला और परंपरा को जीआई टैग ने नई ऊंचाई दी है। पुरी की पट्टाचित्र कला अपनी पारंपरिक चित्रकारी के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। कटक की रूपा तारकासी यानी चांदी की बारीक नक्काशी राज्य की ऐतिहासिक कला का प्रतीक है। संबलपुरी बंधा साड़ी और बोमकाई साड़ी अपनी उत्कृष्ट बुनाई और पारंपरिक डिजाइनों के लिए जानी जाती हैं।

ओडिशा के कृषि और खाद्य उत्पाद भी काफी लोकप्रिय हैं। कंधमाल की हल्दी अपने औषधीय गुणों के लिए मशहूर है। कोरापुट का काला जीरा चावल अपनी सुगंध और स्वाद के कारण ‘चावल का राजकुमार’ कहा जाता है। वहीं, ओडिशा रसगुल्ला, रसबली और ढेंकनाल मगजी जैसी मिठाइयों ने देशभर में खास पहचान बनाई है।

पश्चिम बंगाल लंबे समय से अपनी कला, साहित्य और हस्तशिल्प परंपराओं के लिए जाना जाता है। दार्जिलिंग चाय विश्वभर में भारतीय चाय की पहचान मानी जाती है। शांतिपुरी साड़ी, नक्शी कांथा और बंगाल पटचित्र जैसी कलाएं राज्य की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए हैं।

बंगाल के खाद्य उत्पादों में जॉयनगर मोआ, नोलेन गुरेर संदेश, मिहिदाना और सीताभोग जैसी मिठाइयां लोगों को बेहद पसंद आती हैं। मालदा के फजली, हिमसागर और लक्ष्मणभोग आम अपनी मिठास के कारण खास पहचान रखते हैं। वहीं, गोविंदभोग और तुलैपंजी चावल भी अपनी गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध हैं।

मध्य प्रदेश के जीआई उत्पाद राज्य की परंपरा और शिल्पकला को दुनिया के सामने पेश करते हैं। महेश्वरी और चंदेरी साड़ियां देश की सबसे प्रसिद्ध हथकरघा साड़ियों में शामिल हैं। बाघ प्रिंट अपनी प्राकृतिक रंगाई और ब्लॉक प्रिंटिंग तकनीक के लिए जाना जाता है। ग्वालियर के कालीन और जबलपुर का पत्थर शिल्प भी अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच बना चुके हैं।

खाद्य उत्पादों में मुरैना की गजक, रतलामी सेव और शरबती गेहूं विशेष रूप से लोकप्रिय हैं। रीवा का सुंदरजा आम और बालाघाट का चिन्नौर चावल भी अपनी खास गुणवत्ता के कारण पहचान बना चुके हैं। डिंडोरी की गोंड पेंटिंग और लौह शिल्प आदिवासी कला की अनमोल धरोहर माने जाते हैं।

छत्तीसगढ़ भी जीआई उत्पादों के जरिए अपनी सांस्कृतिक पहचान मजबूत कर रहा है। बस्तर ढोकरा कला राज्य का पहला जीआई टैग प्राप्त उत्पाद था। यह धातु से तैयार की जाने वाली प्राचीन कलाकृति है, जिसे देश-विदेश में सराहा जाता है। बस्तर आयरन क्राफ्ट और वुडन क्राफ्ट भी आदिवासी शिल्पकला के शानदार उदाहरण हैं।

राज्य का जीराफूल चावल अपनी सुगंध और महीन दानों के लिए प्रसिद्ध है। चांपा सिल्क साड़ी अपनी चमक और सुंदर बुनाई के कारण अलग पहचान रखती है।

Source: IANS

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