शारीरिक और मानसिक शुद्धि का आधार, जानिए क्या है 'षट्कर्म' योगासन

नई दिल्ली, 16 अप्रैल। भारतीय परंपरा में प्राचीन काल से ही शरीर, मन और आत्मा की पूर्ण रूप से शुद्धि को अत्यंत महत्व दिया गया है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए योग की प्राचीन विधा षट्कर्म योगासन कई लोगों के स्वास्थ्य का आधार बना हुआ है।

इसके नियमति अभ्यास से शरीर की शुद्धि होने के साथ-साथ मन शांत रहता है। यह योगाभ्यास हठयोग के छह यौगिक शुद्धता क्रियाओं का एक सेट है, जिसका जिक्र योग के प्राचीन ग्रंथों में है। हठयोग के इन छह शुद्धिकरण क्रियाओं को नियमित करने से न सिर्फ शरीर की अंदरूनी सफाई होती है बल्कि मन शांत व स्पष्ट होता है तथा आत्मा की ऊर्जा बढ़ती है।

षट्कर्म योग की छह प्रमुख शुद्धि क्रियाओं का समूह है, जिनका उल्लेख हठयोग प्रदीपिका, घेरंड संहिता और अन्य प्राचीन योग ग्रंथों में मिलता है। इनका मुख्य उद्देश्य शरीर के विभिन्न अंगों से विषाक्त पदार्थों, बलगम और अपशिष्ट को बाहर निकालना है। इन छह क्रियाओं को नेति, धौति, बस्ति, नौलि, त्राटक और कपालभाति कहा जाता है।

हठयोग प्रदीपिका (स्वामी स्वात्माराम द्वारा रचित) के अनुसार, षट्कर्म (छह शुद्धि क्रियाएं) शरीर और मन को शुद्ध करने की प्रमुख तकनीकें हैं, जो कफ, पित्त और वात दोषों को संतुलित करती हैं। इन अभ्यासों का मुख्य उद्देश्य शरीर को आसन और प्राणायाम के लिए तैयार करना है, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जिनका शरीर कफ या मेद (मोटापे) से ग्रस्त है।

इसके नियमित अभ्यास से शरीर फिट रहता है और मानसिक-आध्यात्मिक स्तर पर भी प्रगति करता है। यह शरीर की आंतरिक सफाई का सबसे प्रभावी तरीका है। साथ ही, यह शरीर से विषाक्त पदार्थों (विजातीय द्रव्यों) को बाहर निकालता है और मन को शांत करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

हठयोग प्रदीपिका के अनुसार, यदि किसी के शरीर में कफ या मेद की अधिकता न हो, तो उसे इन क्रियाओं का अभ्यास करने की आवश्यकता नहीं है। इन अभ्यासों को किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही किया जाना चाहिए।

Source: IANS

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