मदरसों को सरकारी वित्तीय सहायता बंद करने और राम मंदिर चंदा विवाद की निष्पक्ष छानबीन की मौलाना साजिद रशीदी ने की मांग

नई दिल्ली, 11 जुलाई । ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने विभिन्न मसलों पर अपनी प्रतिक्रिया दी है, जिनमें उत्तराखंड के मदरसों को ग्रांट देने का निर्णय, राम मंदिर के चंदे से जुड़ा विवाद, बहुविवाह को लेकर असम सरकार का फैसला और वंदे मातरम एवं जन-गण-मन पर गृह मंत्रालय (एमएचए) के दिशानिर्देश शामिल हैं। उन्होंने इस दौरान सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े किए और कई मामलों में अपने दृष्टिकोण को विस्तार से साझा किया।

उत्तराखंड में मदरसों को वित्तीय सहायता दिए जाने के फैसले पर मौलाना साजिद रशीदी ने बताया कि देश में दो श्रेणियों के मदरसे संचालित किए जाते हैं। पहली श्रेणी में वे मदरसे आते हैं जो सरकार से मान्यता प्राप्त हैं और उन्हें भवन, शिक्षकों के वेतन एवं अन्य व्यवस्थाओं के लिए सरकारी मदद मिलती है, जबकि दूसरी श्रेणी के मदरसे समाज के दान और जकात से चलाए जाते हैं तथा सरकार से कोई वित्तीय सहायता नहीं लेते। उनकी राय है कि सरकारी अनुदान पाने वाले मदरसों को बंद कर दिया जाना चाहिए ताकि समाज में यह गलत संदेश न जाए कि सभी मदरसे सरकारी मदद पर निर्भर हैं। जो मदरसे केवल समाज के सहयोग से चल रहे हैं, उनका सरकार के साथ कोई आर्थिक संबंध नहीं है और सरकार का काम सिर्फ उनके पंजीकरण की प्रक्रिया तक ही सीमित रहना चाहिए।

राम मंदिर चंदे से जुड़े कथित विवाद पर मौलाना रशीदी ने कहा कि यदि चंदे में अनियमितताओं के आरोप सही हैं तो यह केवल आर्थिक मामला नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा विषय है। जिन लोगों ने अपनी श्रद्धा से धन, आभूषण और अन्य वस्तुएं दान कीं, उनकी भावनाओं के साथ कथित रूप से विश्वासघात हुआ है। इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कुछ पदाधिकारियों ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया है तो उन इस्तीफों को सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया। रशीदी ने आरोप लगाया कि इस विवाद से ध्यान हटाने के लिए अन्य राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता दी जा रही है। इस मामले की पूरी सच्चाई जनता के सामने आनी चाहिए।

असम सरकार द्वारा बहुविवाह करने वालों को सरकारी योजनाओं से वंचित करने के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए मौलाना रशीदी ने कहा कि वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों में एक परिवार का पालन-पोषण करना ही कठिन है, ऐसे में बहुविवाह को बड़ा सामाजिक मुद्दा बनाना उचित नहीं है। इस प्रकार के बयान और फैसले मुसलमानों और इस्लाम की छवि खराब करने के उद्देश्य से दिए जाते हैं। उन्होंने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के कुछ पुराने बयानों का उल्लेख करते हुए भी अपनी असहमति जताई।

गृह मंत्रालय की ओर से वंदे मातरम और जन-गण-मन को लेकर जारी गाइडलाइंस पर मौलाना ने कहा कि सरकार को चाहिए कि वह जनता के सामने अपने काम को रखे। देश महंगाई, बेरोजगारी और शिक्षा जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, इसलिए सरकार को इन मुद्दों पर अधिक ध्यान देना चाहिए। वंदे मातरम राष्ट्रगीत है जबकि जन-गण-मन राष्ट्रगान है, इसलिए यदि किसी व्यवस्था में बदलाव करना है तो वह संसद के माध्यम से होना चाहिए। इस प्रकार के मामलों में संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया जाना आवश्यक है।

हाल ही में लड़कियों की शादी की उम्र और दुष्कर्म की घटनाओं को लेकर दिए गए अपने बयान पर सफाई देते हुए मौलाना ने कहा कि उनके बयान को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा कि उन्होंने केवल एक सामाजिक मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित किया था। मैंने हाईकोर्ट की उस टिप्पणी के संदर्भ में अपनी बात रखी थी, जिसमें कहा गया था कि कोई भी पर्सनल लॉ पोक्सो अधिनियम से ऊपर नहीं हो सकता। देश में कम उम्र की बच्चियों के साथ दुष्कर्म की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं और इस सामाजिक समस्या पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। इस्लामी शरीयत में बालिग होने के बाद विवाह की अनुमति का प्रावधान है और इस विषय पर न्यायपालिका, संसद, चिकित्सा विशेषज्ञों तथा समाज के विद्वानों के बीच व्यापक चर्चा होनी चाहिए।

उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी नहीं कहा कि देर से शादी होना दुष्कर्म का कारण है। उन्होंने केवल सामाजिक परिस्थितियों और व्यक्तिगत कानूनों के संदर्भ में बहस की आवश्यकता पर जोर दिया था।

Source: IANS

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