मनचाहा जीवनसाथी पाने के लिए क्यों किया जाता है श्रावण सोमवार व्रत? पढ़ें इससे जुड़ी पौराणिक कथा

नई दिल्ली, 22 जुलाई । हिंदू धर्म में सावन के महीने को भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत पवित्र माना गया है। ऐसी मान्यता है कि इस पूरे माह में भगवान शिव की पूजा-अर्चना और व्रत करने से विशेष फल प्राप्त होते हैं। विशेष रूप से सावन सोमवार के व्रत को बेहद शुभ माना जाता है, यही कारण है कि इस दिन शिवालयों में शिव भक्तों की भारी भीड़ जुटती है। अविवाहित कन्याओं से लेकर सुहागिन महिलाएं तक इस व्रत को पूरे श्रद्धा भाव के साथ रखती हैं।

अविवाहित कन्याओं के बीच यह मान्यता बेहद लोकप्रिय है कि सावन सोमवार का व्रत रखने से उन्हें मनचाहा और सुयोग्य जीवनसाथी प्राप्त होता है। वहीं, विवाहित स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए यह व्रत करती हैं। लेकिन क्या आपने कभी यह विचार किया है कि इस मान्यता के पीछे का मुख्य कारण क्या है? इसका उत्तर हमें पौराणिक कथा में मिलता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने वर्षों तक कठोर तपस्या की। कहा जाता है कि उन्होंने कठिन व्रत रखे, भोजन और जल का त्याग किया और पूरी श्रद्धा के साथ भगवान शिव की आराधना की। उनकी अटूट भक्ति, धैर्य और समर्पण से भगवान शिव प्रसन्न हुए और अंततः उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसी कथा के आधार पर यह विश्वास बना कि जो कन्याएं सच्चे मन से सावन सोमवार का व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं, उन्हें भी योग्य जीवनसाथी का आशीर्वाद मिलता है।

यह व्रत व्यक्ति को धैर्य, संयम, आत्मविश्वास और भक्ति का महत्व सिखाता है। भगवान शिव की उपासना के माध्यम से जीवन में सकारात्मक सोच और मानसिक शांति भी प्राप्त होती है।

सावन सोमवार के व्रत की शुरुआत सुबह जल्दी उठकर स्नान करने से होती है। इसके बाद साफ और सात्विक वस्त्र पहनकर भगवान शिव की पूजा की जाती है। शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, भस्म और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। कई भक्त पूरे दिन निर्जला या फलाहार व्रत रखते हैं। शाम को भगवान शिव की आरती की जाती है और व्रत कथा सुनी जाती है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन के दौरान सात्विक भोजन करना चाहिए। लहसुन, प्याज, मांसाहार और नशे जैसी चीजों से दूर रहना चाहिए। साथ ही मन, वचन और कर्म की पवित्रता बनाए रखने पर भी विशेष जोर दिया जाता है। माना जाता है कि श्रद्धा और नियमों के साथ किया गया व्रत ही शुभ फल देता है।

 

Source: IANS

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