ग्लेशियर टूटने से आई अचानक बाढ़ तक: तिब्बत आपदा ने चीन की चुप्पी पर उठाए सवाल

ब्रुसेल्स, 29 अगस्त । तिब्बत और नेपाल के कई गांवों में आई विनाशकारी बाढ़ ने यह चेतावनी दी है कि प्रकृति राजनीति का इंतजार नहीं करती।

एक रिपोर्ट में कहा गया है कि चीनी अधिकारियों ने हिमस्खलन की खबरों को दबाने की कोशिश की, लेकिन ग्लेशियर के गर्जन, धरती के कंपन और नीचे की ओर बहते बाढ़ के पानी ने इस आपदा की भयावहता को उजागर कर दिया, जिसे सेंसरशिप के जरिए छिपाया नहीं जा सकता।

दलाई लामा के भतीजे खेदरूब थोंडुप ने यूरोपियन टाइम्स में लिखा, "जब लांगटांग लिरुंग पर्वत के ऊपर मौजूद ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर दो किलोमीटर से अधिक नीचे घाटी में गिरा तो धरती भी कांप उठी। बर्फ के इस विशाल हिमस्खलन से 5.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर भूकंपीय ऊर्जा निकली, जिसने नेपाल-तिब्बत सीमा पर स्थित गांवों में अचानक आई बाढ़ को जन्म दिया, लेकिन तिब्बत के अंदर यह त्रासदी केवल फुसफुसाहटों तक सीमित है।"

उन्होंने आगे कहा, "बीजिंग की सेंसरशिप व्यवस्था ने यह सुनिश्चित किया है कि इस तबाही को लेकर कोई आधिकारिक बुलेटिन, स्थानीय रिपोर्ट या सार्वजनिक स्वीकारोक्ति सामने न आए। यह चुप्पी संयोग नहीं, बल्कि एक नीति है।"

थोंडुप के अनुसार, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी तिब्बत को एक नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में नहीं, बल्कि 'स्थिरता' दिखाने के मंच के रूप में देखती है। उनका कहना है कि ऐसी आपदाएं उस छवि को नुकसान पहुंचाती हैं। वहीं, जलवायु परिवर्तन के दबाव में ग्लेशियरों के टूटने की बात स्वीकार करना हिमालय में चीन की बड़े पैमाने की जलविद्युत और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की कमजोरियों को भी उजागर कर सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि नेपाल तक पहुंची अचानक बाढ़ ने दिखा दिया कि इस तरह की आपदाओं के खतरे सीमाओं से परे तक फैलते हैं, लेकिन आधिकारिक चुप्पी के कारण संभावित 'कूटनीतिक असहजता' से बचने की कोशिश की जाती है। साथ ही तिब्बती लोगों की आवाज दबा दी जाती है, स्थानीय प्रत्यक्षदर्शियों को बोलने का मंच नहीं मिलता और सीमा क्षेत्रों से आने वाली जानकारियों को 'अफवाह' बताकर जल्दी हटा दिया जाता है।

यूरोपियन टाइम्स के अनुसार, "पूरी घाटियां बाढ़ के तेज बहाव से बदल गई हैं। नेपाल में परिवार अपने प्रियजनों की मौत का शोक मना रहे हैं, जबकि सीमा के दूसरी ओर तिब्बती लोगों को अपने लापता रिश्तेदारों या गांवों की स्थिति तक की जानकारी नहीं मिल पा रही है। आधिकारिक सूचना के अभाव में न तो राहत कार्यों का समन्वय हो रहा है, न ही नीचे के क्षेत्रों को चेतावनी दी जा रही है और न ही किसी की जवाबदेही तय हो रही है। यहां चुप्पी तटस्थ नहीं, बल्कि घातक है।"

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यह पहला अवसर नहीं है जब बीजिंग पर तिब्बत में आई किसी आपदा की खबर दबाने का आरोप लगा हो। इससे पहले भी भूकंप, भूस्खलन और बांध दुर्घटनाओं से जुड़ी घटनाओं को आधिकारिक माध्यमों में कम महत्व दिया गया या नजरअंदाज किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, "लांगटांग लिरुंग के पास ग्लेशियर का टूटना एक व्यापक पैटर्न का हिस्सा है। यहां आपदाओं को पारदर्शिता की मांग करने वाली आपात स्थिति के बजाय राजनीतिक वैधता के लिए खतरे के रूप में देखा जाता है। वास्तविकता को नियंत्रित करने की उम्मीद करती है, लेकिन तिब्बत से निकलने वाली नदियां, जो नेपाल, भारत और बांग्लादेश तक जाती हैं, उन्हें सेंसर नहीं किया जा सकता। वे सच को अपने साथ नीचे तक लेकर जाती हैं।"

रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया कि हिमालय क्षेत्र वैश्विक औसत की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहा है। ग्लेशियरों के पिघलने, अस्थिर होने और टूटने की घटनाएं बढ़ रही हैं, और हर ऐसी घटना अपने साथ ऐसे परिणाम लेकर आती है जिनका प्रभाव भूगर्भीय और भू-राजनीतिक, दोनों स्तरों पर महसूस किया जाता है।

Source: IANS

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