नकारात्मक वैश्विक संकेतों के चलते शेयर बाजार में भारी गिरावट, सेंसेक्स और निफ्टी 1.5 प्रतिशत फिसले

मुंबई, 11 मई । पश्चिम एशिया में जारी तनावों के बीच नकारात्मक वैश्विक संकेतों के चलते सप्ताह के पहले कारोबारी दिन सोमवार को भारतीय शेयर बाजार में भारी बिकवाली देखने को मिली और प्रमुख बेंचमार्क निफ्टी50 और सेंसेक्स 1.5 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट के साथ लाल निशान में बंद हुए।

बाजार बंद होने के समय 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 1312.91 अंकों यानी 1.70 प्रतिशत की गिरावट के साथ 76,015.28 पर था, तो वहीं एनएसई निफ्टी50 360.30 अंक (1.49 प्रतिशत) गिरकर 23,815.85 पर पहुंच गया।

दिन के दौरान सेंसेक्स 76,638.09 पर खुलकर 1,300 अंकों या 1.5 प्रतिशत से अधिक गिरकर 75,957.40 के दिन के निचले स्तर पर आ गया, जबकि एनएसई निफ्टी 23,970.10 पर खुलकर दिन के दौरान 1 प्रतिशत से अधिक गिरकर 23,799.10 के निचले स्तर पर पहुंच गया।

व्यापक बाजार में निफ्टी मिडकैप में 1.05 प्रतिशत और निफ्टी स्मॉलकैप सूचकांक में 1.13 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

वहीं, सेक्टरवार देखें तो सबसे ज्यादा निफ्टी कंज्यूमर ड्यूरेबल में 3.73 प्रतिशत और निफ्टी रियल्टी में 3.05 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसके साथ ही निफ्टी मीडिया, निफ्टी पीएसयू बैंक और निफ्टी ऑयल एंड गैस में 2 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आई। इसके अलावा, निफ्टी ऑटो, निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज, निफ्टी मेटल और निफ्टी प्राइवेट बैक का प्रदर्शन भी खराब रहा।

निफ्टी पैक में सबसे ज्यादा टाटा कंज्यूमर के शेयरों में 8 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़त देखने को मिली। इसके बाद मैक्स हेल्थ के शेयरों में 2.7 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। इसके अलावा कोल इंडिया, सन फार्मा, एचयूएल, ग्रासिम, ओएनजीसी, अदाणी पोर्ट्स और एसबीआई लाइफ के शेयरों में भी तेजी देखने को मिली। इसके विपरीत, टाइटन, इंडिगो, एसबीआई, इटरनल, जियो फाइनेंशियल सर्विसेज, भारती एयरटेल और रिलायंस के शेयरों में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई और ये दिन के टॉप लूजर्स की लिस्ट में शामिल रहे।

इस दौरान, बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण पिछले सत्र के 473.5 लाख करोड़ रुपए से घटकर लगभग 467.5 लाख करोड़ रुपए हो गया, जिससे निवेशकों को करीब 6 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।

इस बीच, ब्रेंट क्रूड का मई फ्यूचर्स 2.12 प्रतिशत बढ़कर 103.4 डॉलर प्रति बैरल के करीब कारोबार करता नजर आया।

मार्केट एक्सपर्ट सुनील शाह ने न्यूज एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में कहा कि शेयर बाजार में आई गिरावट की वजह केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील नहीं है, बल्कि इसके पीछे पश्चिम एशिया में जारी तनाव और कच्चे तेल की लगातार ऊंची कीमतें सबसे बड़ा कारण हैं। उन्होंने कहा कि पिछले सप्ताह बाजार को उम्मीद थी कि होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ा संकट जल्द खत्म हो जाएगा और सीजफायर के बाद कोई स्थायी समझौता हो सकता है। इसी उम्मीद में बाजार में तेजी का माहौल बनने लगा था और कच्चे तेल की कीमतें भी नीचे आने लगी थीं।

उन्होंने आगे कहा कि पहले क्रूड ऑयल की कीमतें 115-120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं, जो बाद में 90 डॉलर के आसपास आ गईं। भारत की जीडीपी वृद्धि, कॉरपोरेट कमाई और अर्थव्यवस्था के कई अनुमान 65 से 75 डॉलर प्रति बैरल के क्रूड ऑयल दाम को ध्यान में रखकर बनाए गए थे। लेकिन अब लगातार तीसरे महीने तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं और होर्मुज संकट के जल्द खत्म होने के संकेत भी नहीं मिल रहे हैं। इसी वजह से बाजार में घबराहट और अनिश्चितता बनी हुई है।

एक्सपर्ट सुनील शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की अपील का मकसद देश को आर्थिक रूप से मजबूत बनाए रखना है। भारत अपनी जरूरत का करीब 70 से 75 प्रतिशत ऊर्जा आयात करता है। उन्होंने बताया कि सरकार चाहती है कि लोग पेट्रोल-डीजल का उपयोग सोच-समझकर करें और अनावश्यक विदेशी यात्राओं व सोने की खरीदारी को कुछ समय के लिए टालें। इससे डॉलर की बचत होगी, चालू खाता घाटा कम रहेगा और रुपए पर दबाव भी कम पड़ेगा।

उन्होंने आगे कहा कि अगर लोग गैर-जरूरी खर्च और ईंधन की बर्बादी कम करते हैं तो इसका फायदा देश की अर्थव्यवस्था और कॉरपोरेट सेक्टर, दोनों को मिलेगा। उनके मुताबिक बाजार की असली चिंता अभी भी कच्चे तेल की कीमतें हैं। अगर तेल फिर से 65-75 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में लौट आता है तो भारतीय बाजार और अर्थव्यवस्था के लिए यह बड़ा सकारात्मक संकेत होगा।

वहीं, मार्केट एक्सपर्ट एपी शुक्ला ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि जब देश का कोई बड़ा नेता गंभीर अपील करता है तो उसका असर स्वाभाविक रूप से बाजार और लोगों की सोच पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से एक साल तक सोने की खरीदारी टालने, पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने और वैकल्पिक ऊर्जा की ओर बढ़ने की अपील की है।

एक्सपर्ट ने बताया कि भारत हर साल बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और सोना आयात करता है, जिसके लिए भारी मात्रा में डॉलर खर्च होते हैं। उन्होंने कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद डॉलर के मुकाबले रुपए में काफी कमजोरी आई है और सोने की कीमतें भी तेजी से बढ़ी हैं। भारत हर साल लगभग 700-800 टन सोना आयात करता है, जबकि कच्चे तेल पर भी भारी विदेशी मुद्रा खर्च होती है।

उन्होंने कहा कि सोना एक अच्छा एसेट क्लास जरूर है, लेकिन ज्यादातर सोना लॉकरों में बंद रहता है और उसका अर्थव्यवस्था में सक्रिय उपयोग नहीं होता। इसके विपरीत, अगर वही पैसा अर्थव्यवस्था में घूमता रहे तो उससे विकास और रोजगार दोनों बढ़ सकते हैं।

एक्सपर्ट ने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट की स्थिति ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। तेल उत्पादन और सप्लाई प्रभावित होने से वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है। उन्होंने कहा कि चीन और भारत जैसे बड़े उपभोक्ता देशों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया के देशों को आपसी बातचीत और मध्यस्थता के जरिए विवादों का समाधान निकालना चाहिए, क्योंकि युद्ध से अंततः सभी देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। उनके मुताबिक, शांति और स्थिरता ही वैश्विक आर्थिक विकास का सबसे बड़ा आधार है।

Source: IANS

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