अभिनेत्री आरुषि निशंक ने किया ‘स्पर्श गंगा’ अभियान का समर्थन, प्लास्टिक मुक्त यात्रा पर जोर

देहरादून, 1 मई । उत्तराखंड की पवित्र चारधाम यात्रा को इस बार 'प्लास्टिक-मुक्त' बनाने के लिए 'स्पर्श गंगा' अभियान की शुरुआत की गई है। प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण के साथ शुरू हुई इस पहल का उद्देश्य श्रद्धालुओं को जागरूक करना और हिमालय को कचरे के ढेर से बचाना है। अभिनेत्री आरुषि निशंक ने इस मुहिम को अपना समर्थन दिया।

आरुषि निशंक ने आईएएनएस के साथ बातचीत में कहा, "यह मुहिम मेरे लिए आज की नहीं बल्कि तब से है जब मैंने देवभूमि उत्तराखंड में जन्म लिया था। यह हमारी जन्मभूमि है और इसे सुरक्षित रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।"

अभिनेत्री ने बढ़ती भीड़ और कचरे की समस्या पर चिंता जाहिर की। उन्होंने बताया कि यहां पर हर साल लाखों टन कचरा जमा हो जाता है, जिसमें सबसे घातक प्लास्टिक वेस्ट है। उन्होंने 'सब-फ्लोर इकोनॉमी' (कचरे से कमाई) के विचार को साझा करते हुए कहा कि यात्रियों को यह समझना होगा कि प्लास्टिक को सही जगह कूड़ेदान में डालकर भी पुण्य कमाया जा सकता है।

उन्होंने अभियान की रणनीति के बारे में बताया, "यात्रा मार्ग पर 200 अलग अलग चिन्हित स्थानों पर लगभग 10,000 स्वयंसेवकों को तैनात किया जाएगा। लाखों की संख्या में कूड़ेदान लगाए गए हैं। स्वयंसेवक यात्रियों को बताएंगे कि किस तरह का कचरा कहां फेंकना है। इकट्ठा की गई सभी प्लास्टिक बोतलों को रीसाइक्लिंग के लिए भेजा जाएगा, जिसके लिए विशेष संस्थानों के साथ साझेदारी की गई है।"

'माटी स्वस्तिका' अभियान के प्रणेता और पद्म श्री डॉ. कल्याण सिंह रावत ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि आज पूरा हिमालय पर्यटकों से भरा है, लेकिन इसके साथ ही प्लास्टिक का ढेर भी बढ़ रहा है। उन्होंने कहा, प्लास्टिक अब माइक्रो और नैनो-प्लास्टिक में बदलकर हवा में घुल चुका है। यह नैनो प्लास्टिक हमारी नसों के जरिए शरीर में प्रवेश कर रहा है, जो आज कम उम्र में बढ़ते हार्ट अटैक का एक बड़ा कारण बन रहा है।"

डॉ. कल्याण सिंह रावत ने स्पष्ट किया कि प्लास्टिक का संकट केवल पर्यटकों तक सीमित नहीं, बल्कि गांवों में होने वाले शादी-ब्याह और अनुष्ठानों ने भी इसे बढ़ा दिया है। उन्होंने कहा, "हमने गांवों में 'कचरा घर' बनाए, लेकिन लोगों की सोच नहीं बदल पाई। लोग अब भी अपने आंगन में कचरा फैलाते हैं। हमें अपनी सोच बदलनी होगी और प्लास्टिक की जगह पारंपरिक धातु के बर्तनों का उपयोग शुरू करना होगा।"

Source: IANS

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