आरोपियों की तस्वीरें-वीडियो सोशल मीडिया पर डालने पर रोक की मांग,

नई दिल्ली, 18 अगस्त । पुलिस द्वारा आरोपियों की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किए जाने पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता का कहना है कि आरोपियों के निष्पक्ष सुनवाई के मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए ऐसा करना जरूरी है। इस याचिका पर कोर्ट ने केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

याचिकाकर्ता की इस बात पर ध्यान देते हुए कि आरोपियों की पहचान उजागर करने से निष्पक्ष सुनवाई के उनके अधिकार पर असर पड़ सकता है, चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने पुलिस संगठनों द्वारा सोशल मीडिया के इस्तेमाल के लिए गाइडलाइंस बनाने के सुझाव पर गौर किया।

सीजेआई सूर्य कांत ने सवाल उठाया कि पुलिस को ऑनलाइन तस्वीरें शेयर करने से रोकने पर डिजिटल इकोसिस्टम में कंटेंट के फैलने को कैसे रोका जा सकता है।

सीजेआई ने कहा, "यह कोई ऐसी सीमा नहीं है जिसे आप बस बंद कर दें।" उन्होंने इस बात से सहमति जताई कि ऐसा कंटेंट अपलोड होने से रोकना जरूरी है जिससे आरोपियों के चेहरे या पहचान का पता चले।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता हेमेंद्र पटेल की ओर से सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन पेश हुए। उन्होंने ऐसी तस्वीरें और वीडियो दिखाए जिनमें आरोपियों को हथकड़ी पहने या घुटनों के बल बैठे हुए दिखाया गया था।

राष्ट्रीय स्तर पर एक जैसी गाइडलाइंस की जरूरत पर जोर देते हुए शंकरनारायणन ने कहा कि एक ऐसे सिस्टम की बहुत जरूरत है, जो पुलिस द्वारा बनाए गए उस कंटेंट को रोक सके, जिससे आरोपी के अधिकारों का उल्लंघन होता हो, जबकि उसका अपराध अभी साबित नहीं हुआ है।

उन्होंने कहा कि कुछ हाईकोर्ट में पहले भी ऐसे मामलों पर विचार किया गया है, लेकिन पुलिस संगठनों को आरोपियों की तस्वीरें और वीडियो फैलाने से रोकने के लिए एक राष्ट्रीय स्तर के एक जैसे फ्रेमवर्क की गुंजाइश है।

इस याचिका में केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को भी पक्षकार बनाया गया था। इसमें यह भी मांग की गई थी कि अगर कोई आपत्ति हो तो ऐसे कंटेंट को तुरंत हटाने के लिए एक औपचारिक, पारदर्शी और व्यवस्थित सिस्टम बनाया जाए।

जनवरी में राजस्थान हाई कोर्ट के एक मामले का भी जिक्र किया गया, जिसमें जजों ने गिरफ्तार आरोपी से जुड़े सोशल मीडिया कंटेंट को हटाने का आदेश दिया था।

इस मामले के बाद राज्य पुलिस ने एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) जारी किया, जिसमें गिरफ्तार लोगों की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर या मीडियाकर्मियों के साथ अपलोड या शेयर करने की प्रथा पर रोक लगाई गई।

Source: IANS

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