हिंदी दिवस : बदलते दौर के साथ बदलने वाली 'हिंदी', आज 'उर्मिला-विषयक

नई दिल्ली, 14 सितंबर । भाषा केवल प्रचार या प्रसार का विषय नहीं है, वह तो अभिव्यक्त करने की रचनाशीलता, संवाद करने, संवेदना जताने और संबंधों का सही रेखांकन करने का जरिया है।

भाषा में शब्दों को जंजीर के साथ कभी नहीं बांधा गया। मतलब भाषा में 'भदेस' शब्दों का प्रयोग भी किसी न किसी तरह के संवाद का, इंगित करने का या फिर मनोभावों का अच्छा या बुरा व्यक्त करने का जरिया रहा है। भाषा में रचे साहित्य ने तो इससे भी एक कदम आगे बढ़कर भाषाओं में स्थापित 'भदेस' शब्दों को ऐसे रेखांकित किया मानो वह भाषा का अहम हिस्सा हो। गालियां भी तो संवेदना का ही मूल रही। अलग बात है कि यह भाषाओं में सूचक के तौर पर इस्तेमाल हुई और इसका रेखांकन साहित्य में भी उसी रूप में किया गया।

भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली हिंदी को एक दिवस की जरूरत क्यों पड़ी, यह जानना बेहद जरूरी है। दरअसल, दुनिया में चीनी भाषा (मैंडरिन) के बाद सबसे ज्यादा बोली जाने वाली और दुनिया के 10 शक्तिशाली भाषाओं में शामिल हिंदी अपनी दुर्दशा के लिए खुद जिम्मेदार नहीं है। समझना होगा कि किसी भी भाषा का पतन तब तेजी से शुरू होता है, जब वह राजकीय कार्य की भाषा बन जाए और उसमें किसी भी अन्य भाषा की तरह का लचीलापन समाप्त होने लगे।

जब भाषा व्याकरण निष्ठ होने की तैयारी करने लगे, उसमें किए गए संवाद में से अशुद्धि को ढूंढा जाने लगे तो फिर भाषा जो सहज संवाद का विषय बनकर उभरती है, वह अस्तित्व खोने लगती है। कालांतर में संस्कृत और पाली जैसी भाषाओं ने भी इसी वजह से दम तोड़ दिया।

एक हजार साल से ज्यादा पुराने इतिहास के साथ चल रही हिंदी की यह दुर्दशा यकायक तो नहीं हुई। इसकी दुर्दशा के लिए केवल समाज नहीं, बल्कि बाजार और राजनीति दोनों जिम्मेदार हैं। हालांकि, हिंदी के बढ़ते पाठक वर्ग ने इस भाषा के साहित्य को संभाले रखा और यही वजह है कि आज जो भी इस भाषा का अस्तित्व बचा हुआ दिखता है, उसके पीछे सबसे बड़ा कारण यही है।

प्राचीन संस्कृत की कोख से जन्मी हिंदी भाषा पहले अपभ्रंश रूप में विद्यमान हुई। लेकिन, 1,000 से ज्यादा साल पहले से वह भाषा सजी-संवरी और आज जो आप हिंदी का स्वरूप देख रहे हैं, वह तभी की देन है। हालांकि, तब भी इस भाषा को अपना शुद्ध रूप धारण करने में 250 से ज्यादा वर्ष लग गए। हिंदी भाषा में साहित्य सृजन की बात हो तो भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (1805 ई.) को हिंदी भाषा का पिता कहा जाता है।

हिंदी दिवस पर महावीर प्रसाद द्विवेदी का लिखा एक निबंध याद आता है, शीर्षक था 'कवियों की उर्मिला-विषयक उदासीनता'। शीर्षक से स्पष्ट हो गया होगा कि निबंधकार की सोच क्या थी? रामायण में एक पात्र थीं उर्मिला, लक्ष्मण की व्याहता (पत्नी) जिसके बारे में सबसे कम पढ़ने और जानने को मिलता है। प्रभु श्रीराम के साथ माता जानकी और भाई लक्ष्मण 14 साल के वनवास पर थे, लेकिन महलों में रहकर जो 14 साल तक बिना वनगमन के उन सबसे ज्यादा कष्ट में गुजर रही थीं, वह थीं उर्मिला। जिसके पास पति का साथ नहीं था और वह महल में पड़ी थी और पूरे रामायण में उस पात्र को भुला सा दिया गया था। कुछ ऐसा ही हाल हिंदी का भाषा के तौर पर हुआ।

हिंदी भाषा के विकास क्रम पर नजर डालेंगे तो आपको साफ दिख जाएगा। वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत से चलकर पाली, अपभ्रंश से होते हुए जिस भाषा ने आकार लिया, वह थी हिंदी और आज वही हिंदी हिंग्लिश जैसे स्वरूप में पहुंच गई है। हालांकि, किसी भाषा में दूसरी भाषा के शब्दों का जुड़ना उसके सौंदर्य को बढ़ाता है, लेकिन हिंदी के साथ ऐसा नहीं हुआ। इसमें कुछ ऐसी भाषाओं के शब्द जुड़े जो भाषा को कमजोर करते चले गए या भाषा की दरिद्रता का सूचक बन गए।

भारतीय संविधान के निर्माण के साथ किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया गया, हालांकि हिंदी को देश की, अंग्रेजी के साथ आधिकारिक राजभाषा का दर्जा जरूर मिला। जबकि हिंदी के राजभाषा होने के बाद भी राज्य अपने राज्य के लिए राज्यभाषा भी चुनते और अंगीकृत करते रहे हैं।

14 सितंबर 1949 को हिंदी को भारत की आधिकारिक भाषा के रूप में चुन लिया गया। ये निर्णय 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान के लागू होने के दिन से प्रभावी भी हो गया। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया। उससे पहले हिंदी को लेकर कई महान लोगों की राय स्पष्ट थी, जैसे ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय के विचार तो यह थे कि इस समग्र देश की एकता के लिए हिंदी अनिवार्य है।

ब्रह्म समाज से संबद्ध केशव चंद्र सेन ने अपने एक लेख में लिखा, "भारत में एकता का एक ही उपाय है, सारे भारत में एक ही भाषा का व्यवहार हो।" वहीं, स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी कहा था कि हिंदी द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है।

हिंदी को लेकर महात्मा गांधी के विचार भी ऐसे ही थे। उन्होंने कहा, "अगर हिन्दुस्तान को सचमुच आगे बढ़ना है तो चाहे कोई माने या न माने राष्ट्रभाषा तो हिंदी ही बन सकती है, क्योंकि जो स्थान हिंदी को प्राप्त है, वह किसी और भाषा को नहीं मिल सकता है।''

हिंदी का गुणगान आजादी से पहले हर कोई करता रहा और उसे राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की मांग होती रही। धीरे-धीरे राजभाषा शब्द को राष्ट्रभाषा का समानार्थी समझने की भूल होती रही और आज भी यह जारी है। आजादी के बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के समर्थक महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू भी रहे। जबकि, उस समय भी हिंदी विरोधी गुट इसका विरोध कर रहा था और अंग्रेजी को ही राज्य की भाषा बनाए रखने के पक्ष में था।

इसके बाद संविधान में भारत की केवल दो कार्यालयी कामकाजी भाषाओं का जिक्र था, इसमें किसी 'राष्ट्रीय भाषा' का जिक्र भी नहीं था। इनमें से अंग्रेजी का प्रयोग अगले पंद्रह सालों में कम करने का लक्ष्य था, ये पंद्रह साल संविधान लागू होने की तारीख (26 जनवरी, 1950) से अगले 15 साल यानी 26 जनवरी, 1965 को खत्म होने वाले थे। 1965 में जब हिंदी को सभी जगहों पर आवश्यक बना दिया गया तो तमिलनाडु में इसको लेकर हिंसक आंदोलन हुए।

इसके बाद कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने तय किया कि संविधान के लागू हो जाने के 15 साल बाद भी अगर हिंदी को हर जगह लागू किए जाने पर भारत के कई राज्य राजी नहीं हैं तो हिंदी को भारत की एकमात्र ऑफिशियल भाषा नहीं बनाया जा सकता है। इसके बाद सरकार ने राजभाषा अधिनियम, 1963 लागू कर दिया और इसे 1967 में संशोधित किया गया। जिसके जरिए भारत ने एक द्विभाषीय पद्धति को अपना लिया और इसमें अंग्रेजी और हिंदी शामिल रहे।

अब हिंदी की गिरते ग्राफ पर नजर डालें तो उसके साथ जुड़ी दूसरी भाषा इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार हुई। अंग्रेजी ने भारत की संस्कृति और भाषायी विविधता पर ऐसा प्रहार किया और एक ऐसी अपसंस्कृति को बढ़ावा दिया है, जिसमें घरों के अंदर माता-पिता हिंदी और क्षेत्रीय भाषा बोल पाने में समर्थ होने के बाद भी टमाटर को टोमैटो, चावल को राइस और केले को बनाना कहने में गर्व महसूस करने लगे, लोग हिंदी में गिनती भूल गए। परिवार में बुआ, चाची और मौसी जैसे रिश्ते जिनकी अपनी अलग पहचान है, सभी के लिए एक ही संबोधन आंटी हो गया तो वहीं चाचा, फूफा, मौसा सभी अंकल हो गए।

अब एक बार गौर से देखिए तो पता चलेगा कि हिंदी में अन्य भाषा के शब्दों को समाहित करने के बाद उसे पूरा सम्मान दिया गया, ऐसे अन्य भाषा के शब्दों का हिंदी में शामिल होने का कोई विरोध नहीं किया गया। बल्कि उसे सहजता के साथ सहर्ष स्वीकार कर लिया गया। लेकिन, भारत में हिंदी का विरोध सोच से परे है। आश्चर्य की बात यह है कि अंग्रेजी एक विदेशी भाषा है, लेकिन भारत में उसका विरोध न के बराबर होता है। कुछ गैर हिंदी भाषी राज्यों द्वारा हिंदी के विरोध के पीछे यह भ्रम है कि अगर हिंदी सर्वमान्य भाषा बन गई तो क्षेत्रीय भाषाओं का दायरा सिमट जाएगा। हिंदी का विरोध तो कई लोगों की राजनीति चमकाने में भी सहायक रहा है, इसीलिए हिंदी का विरोध राजनीति से भी प्रेरित रहा है।

जबकि, इन विरोधों के विपरीत हिंदी का स्वभाव उस गंगा की तरह है, जो दूसरी नदियों को अपने साथ समाहित करती हुई, स्वयं महानदी बनकर आगे बढ़ती है। संवाद के लिए भाषा की स्वीकारोक्ति के लिए उस भाषा में जो खूबियां होनी चाहिए, जैसे वह भाषा देश के ज्यादातर लोगों द्वारा बोली या समझी जाती हो, उसका व्यापक क्षेत्रीय विस्तार हो, वह भाषा सजीव और सरल हो तथा वह भाषा प्रगतिशील हो, वह अपने अंदर दूसरी भाषाओं के नए शब्दों को समाहित कर सके, ये सब तो हिंदी में मौजूद है। फिर यह समझ में नहीं आता कि महावीर प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में हिंदी को लेकर लोगों में यह 'उर्मिला-विषयक उदासीनता' क्यों आ गई है?

Source: IANS

अन्य समाचार

Advertisement

Advertisement

Advertisement

Get Newsletter