यादों में विलायत खां: ऐसे ही नहीं मिली 'आफताब-ए-सितार' की उपाधि,

नई दिल्ली, 27 अगस्त । 28 अगस्त… सिर्फ कैलेंडर में दर्ज एक तारीख नहीं है। इसी दिन 1928 में जन्म हुआ था एक ऐसे व्यक्ति का जिसके लिए सितार वादन केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि साधना थी। नाम था उस्ताद विलायत खां। भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में उनका नाम आज भी बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है।

उन्हें ‘आफताब-ए-सितार’ कहा गया और यह उपाधि यूं ही नहीं मिली थी। उनके सितार से निकलने वाली धुनों में ऐसी मिठास, ऐसी गहराई और ऐसा भाव होता था कि सुनने वाले को कई बार लगता था, मानो सितार नहीं, कोई गा रहा हो।

विलायत खां का जन्म संगीत की उस खानदानी परंपरा में हुआ, जहां सुर और सितार परिवार की पहचान का हिस्सा थे। उनके पिता उस्ताद इनायत खां और दादा उस्ताद इमदाद खां अपने दौर के जाने-माने सितार वादक थे। परिवार की कई पीढ़ियों से चली आ रही संगीत की विरासत विलायत खां तक पहुंची और उन्होंने इसे सिर्फ आगे बढ़ाया ही नहीं, बल्कि अपनी अलग पहचान भी बनाई।

बचपन से ही विलायत खां का झुकाव संगीत की ओर था। सितार उनके लिए महज एक वाद्य यंत्र नहीं था। वह उसके सुरों में भावनाएं तलाशते थे। यही सोच आगे चलकर उनकी मशहूर ‘गायकी अंग’ शैली की पहचान बनी। उन्होंने सितार पर गायन की बारीकियों को इस तरह उतारा कि उनके वादन में शब्द तो नहीं होते थे, लेकिन सुर बोलते हुए महसूस होते थे।

मींड, गमक और बोल जैसी गायकी की विशेषताओं को उन्होंने सितार की तारों पर इतनी खूबसूरती से साधा कि उनकी धुन सुनकर श्रोता भावुक हो जाते थे। यही वजह थी कि विलायत खां की शैली ने सितार वादन को एक नया आयाम दिया। वह सिर्फ राग नहीं बजाते थे, बल्कि उसे जैसे अपनी आवाज दे देते थे।

लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने का रास्ता बिल्कुल आसान नहीं था। इसके पीछे था घंटों का कठोर रियाज। विलायत खां के रियाज से जुड़े किस्से आज भी उनके जुनून की कहानी कहते हैं। बताया जाता है कि अभ्यास के दौरान उनकी उंगलियां इतनी तेजी से सितार के तारों पर चलती थीं कि कई बार कट जाती थीं और खून तक निकल आता था।

किसी के लिए यह दर्द रियाज रोकने की वजह हो सकता था, लेकिन विलायत खां के लिए नहीं। उनका मानना था कि अगर हजारों सरगम के बीच उंगली कट गई और उन्होंने रुककर आराम कर लिया, तो पूरा अभ्यास टूट जाएगा। फिर उन्हें दोबारा शुरुआत से उसी क्रम को साधना पड़ेगा। इसलिए दर्द के बावजूद उनका रियाज चलता रहता था। यही जुनून उनकी कला में दिखाई देता था।

विलायत खां की पहचान सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रही। आजाद भारत के शुरुआती वर्षों में उन्होंने विदेशों में जाकर भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति दी। 1951 में इंग्लैंड में उनका कार्यक्रम खासतौर पर उल्लेखनीय माना जाता है। इसके बाद उन्होंने दुनिया के कई हिस्सों में भारतीय संगीत और सितार की धुन पहुंचाई। एक समय ऐसा भी था जब वह साल के कई महीने विदेशों में कार्यक्रम करते थे और न्यू जर्सी को अपना दूसरा घर मानते थे।

उनकी लोकप्रियता फिल्मों तक भी पहुंची। सत्यजीत रे की चर्चित फिल्म 'जलसाघर' सहित कुछ फिल्मों में उनके सितार संगीत ने अलग रंग भरा। शास्त्रीय संगीत की गंभीरता के बीच उनकी प्रस्तुति में भावनाओं की ऐसी पकड़ थी कि वह आम श्रोताओं तक भी आसानी से पहुंच जाती थी।

विलायत खां अपनी कला के साथ-साथ अपने बेबाक स्वभाव के लिए भी जाने जाते थे। उन्होंने 1964 में पद्मश्री और 1968 में पद्म विभूषण सम्मान स्वीकार नहीं किया। उनका मानना था कि उनकी कला और योगदान को उचित सम्मान नहीं मिला है। बाद में वर्ष 2000 में उन्हें दोबारा पद्म विभूषण देने की घोषणा हुई, लेकिन उन्होंने इसे भी स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद भी उनकी कला के प्रशंसक थे। उन्हीं के कार्यकाल में उन्हें ‘आफताब-ए-सितार’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। उनके दोनों बेटे शुजात हुसैन खां और हिदायत खां ने भी सितार की परंपरा को आगे बढ़ाया।

13 मार्च 2004 को उस्ताद विलायत खां ने दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन, महान कलाकारों की तरह उनकी विदाई के साथ उनकी कला खत्म नहीं हुई। उनके दोनों बेटे सुजात हुसैन खां और हिदायत खां ने भी सितार की परंपरा को आगे बढ़ाया।

Source: IANS

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