वित्त मंत्री सीतारमण का उद्योग जगत से आह्वान: 'मेड इन इंडिया' से आगे बढ़कर 'इमैजिन्ड इन इंडिया' का लक्ष्य तय करें, आरएंडडी पर खर्च बढ़ाएं
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मंगलवार को भारतीय उद्योग जगत से केवल कारोबार का आकार बढ़ाने के बजाय नवोन्मेषी, मजबूत, सुशासित और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कंपनियां बनाने पर ध्यान देने का आह्वान किया।

नई दिल्ली, 22 सितंबर । केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मंगलवार को भारतीय उद्योग जगत से केवल कारोबार का आकार बढ़ाने के बजाय नवोन्मेषी, मजबूत, सुशासित और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कंपनियां बनाने पर ध्यान देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारत के विकास का अगला चरण गुणवत्ता आधारित होना चाहिए और इसके लिए कॉरपोरेट क्षेत्र को अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) पर अधिक निवेश करना होगा।
ऑल इंडिया मैनेजमेंट एसोसिएशन (एआईएमए) के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि कंपनियों को अपने यहां या शैक्षणिक संस्थानों के साथ साझेदारी के माध्यम से आरएंडडी पर खर्च बढ़ाना चाहिए। इससे नवाचार को बढ़ावा मिलेगा, उत्पादों में सुधार होगा और भारत में अधिक बौद्धिक संपदा (आईपी) का निर्माण होगा।
उन्होंने कहा, "हमारी महत्वाकांक्षा केवल 'मेड इन इंडिया' तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि 'इमैजिन्ड इन इंडिया' होनी चाहिए, जिसमें न केवल यहीं पर निर्मित उत्पाद हों, बल्कि यहीं पर उनकी कल्पना, डिजाइन और तकनीकी विकास भी किया जाए और फिर उन्हें दुनिया के बाजारों तक पहुंचाया जाए।"
सीतारमण ने कहा कि भारत का सकल आरएंडडी व्यय (जीईआरडी) अभी जीडीपी का केवल 0.83 प्रतिशत है, जो ओईसीडी देशों के औसत 2.7 प्रतिशत, चीन के 2.6 प्रतिशत और अमेरिका के 3.5 प्रतिशत से काफी कम है। उन्होंने कहा कि भारत में निजी क्षेत्र का आरएंडडी योगदान केवल 36 प्रतिशत है, जबकि विकसित अर्थव्यवस्थाओं में यह 70 प्रतिशत से अधिक है।
वित्त मंत्री ने कहा कि 'विकसित भारत 2047' की दिशा में आगे बढ़ते हुए भारतीय प्रबंधन की सफलता का आकलन इस आधार पर होगा कि आज कितनी गुणवत्तापूर्ण कंपनियां और संस्थान तैयार किए जा रहे हैं।
उन्होंने प्रबंधन शिक्षा को और व्यावहारिक बनाने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने बताया कि स्टार्टअप संस्थापकों और शुरुआती कर्मचारियों के लिए भर्ती, जिम्मेदारी सौंपने, वित्तीय अनुशासन, ग्राहक प्रबंधन, अनुपालन और संगठनात्मक ढांचा विकसित करने जैसे विषयों पर छोटे और उपयोगी पाठ्यक्रम तैयार किए जाने चाहिए।
सीतारमण ने परिवार-आधारित व्यवसायों के लिए भी विशेष कार्यक्रमों की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि उत्तराधिकार योजना, कॉरपोरेट गवर्नेंस, पेशेवर प्रबंधन, विवाद समाधान और जिम्मेदारियों के बंटवारे जैसे विषयों पर प्रशिक्षण दिए जाने चाहिए।
वित्त मंत्री ने कंपनियों से यह भी कहा कि वे केवल शहरी और उच्च आय वर्ग के उपभोक्ताओं के लिए उत्पाद विकसित करने तक सीमित न रहें। उन्होंने कहा कि भारत की खपत का वास्तविक आधार कृषि, ग्रामीण निर्माण, परिवहन और असंगठित क्षेत्र से जुड़े करोड़ों परिवार हैं।
उन्होंने कहा, "यदि कॉरपोरेट इंडिया केवल शहरी प्रीमियम उपभोक्ताओं पर फोकस करेगा, तो विकास की संरचनात्मक मजबूती कमजोर पड़ सकती है।"
कॉरपोरेट गवर्नेंस पर जोर देते हुए सीतारमण ने उद्योग जगत से सरकार और नियामकों के साथ रचनात्मक संवाद बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि हर मतभेद को तुरंत कानूनी विवाद में बदलने के बजाय बातचीत और परामर्श के जरिए समाधान खोजने का प्रयास किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि व्यवसायों को पारदर्शिता, पूर्वानुमान और संवाद की संस्कृति अपनानी चाहिए, क्योंकि एक परिपक्व अर्थव्यवस्था में असहमति का अर्थ टकराव नहीं होना चाहिए।
Source: IANS

