पितृपक्ष में नई शुरुआत से क्यों करते हैं परहेज, क्यों नहीं होता कोई

नई दिल्ली, 9 सितंबर । सनातन धर्म में पितृपक्ष का बहुत महत्व है, जो इस वर्ष 26 सितंबर से पूर्णिमा श्राद्ध के साथ शुरू होगी और 10 अक्टूबर तक चलेगी। हिन्दू पंचांग के अनुसार, पितृपक्ष के 16 दिन वह अवधि है, जब पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए तर्पण और पिंडदान किए जाते हैं। इसे 'सोलह श्राद्ध' या 'महालय पक्ष' भी कहते हैं।

मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान प्रतिदिन नियमानुसार पूर्वजों का पिंडदान और तर्पण करने से लोगों को पितृ दोष और पूर्वजों के ऋण से मुक्ति मिलती है। परिवारजन को अपने पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।

पितृपक्ष के दौरान ऐसी बहुत सी बातें होती हैं, जिनका मुख्य रूप से ध्यान रखना होता है। अगर ऐसा नहीं होता है तो पूर्वज नाराज हो जाते हैं और परिवार एवं वंश को उसका नकारात्मक प्रभाव झेलना पड़ता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष के दौरान लोगों को कोई नई शुरुआत या मांगलिक कार्य करने से बचना चाहिए। ऐसा क्यों, आइए हम आपको इसके पीछे की वजह के बारे में बताते हैं।

सनातन धर्म में पितृपक्ष वह समय है, जो मुख्य रूप से पूर्वजों के लिए समर्पित होता है। इस दौरान लोगों को प्रतिदिन अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण और पिंडदान करना चाहिए। उनके प्रति अपनी कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त करनी चाहिए। कहा जाता है कि इन 16 दिनों के दौरान शुभ कार्य जैसे शादी-ब्याह, गृह-प्रवेश, सगाई, मुंडन संस्कार, जनेऊ संस्कार और नई संपत्ति या वाहन की खरीद वर्जित होते हैं, ताकि परिवार का पूरा ध्यान और ऊर्जा पूर्वजों की आत्मा की शांति और पितृ-ऋण से मुक्ति पाने पर केंद्रित रहे।

शास्त्रों के मुताबिक, पूर्वजों की पूजा में अनुष्ठान की प्रक्रिया सर्वोपरि होती है, जबकि देवी-देवताओं की पूजा में भक्ति को प्रधानता दी जाती है, इसलिए इस दौरान सावधानी के साथ पूर्वजों की पूजा नियमानुसार हो। परिवार का पूर ध्यान पूर्वजों पर केंद्रित रहें। इसके लिए मांगलिक कार्य या नई शुरुआत से बचा जाता है।

हालांकि, इसके पीछे एक और वजह यह है कि पितृपक्ष की अवधि के दौरान भगवान विष्णु अपने शयन काल, जिसे चातुर्मास भी कहा जाता है, में होते हैं। हरि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी के दौरान कुल चार माह के लिए योगनिद्रा में लीन रहते हैं, इसलिए भी इस दौरान कोई नई शुरुआत या मांगलिक कार्य करने से बचा जाता है। इसके अतिरिक्त भी कई अन्य मान्यता के कारण पितृपक्ष के दौरान नई शुरुआत और मांगलिक कार्य से बचा जाता है।

Source: IANS

अन्य समाचार

Advertisement

Advertisement

Advertisement

Get Newsletter