क्यों मानते हैं 'अप्रैल फूल'?, जानिए कैसे हुई इसकी शुरुआत

नई दिल्ली, 31 मार्च। हर साल 1 अप्रैल आते ही लोग अपने दोस्तों, परिवार और कभी-कभी अजनबियों को भी हंसाने-फंसाने में लग जाते हैं। किसी को नकली खबर भेज देते हैं, किसी के बैग में मजाकिया चीज रख देते हैं या कुछ और करते हैं और फिर देखते हैं कि सामने वाला कैसे हंसता या गुस्सा होता है। यही है अप्रैल फूल्स डे, एक ऐसा दिन जब दुनिया थोड़ी हल्की-फुल्की हो जाती है। 

इस दिन के पीछे एक लंबा इतिहास है। कहा जाता है कि इसकी शुरुआत 16वीं सदी के फ्रांस से हुई थी, जब 1582 में काउंसिल ऑफ ट्रेंट द्वारा 1563 में की गई सिफारिश पर फ्रांस ने जूलियन कैलेंडर से ग्रेगोरियन कैलेंडर को अपना लिया था।

जूलियन कैलेंडर में नया साल अप्रैल के आस-पास शुरू होता था, लेकिन ग्रेगोरियन कैलेंडर में नए साल की शुरुआत 1 जनवरी से होती है। जिन लोगों को इस बात की खबर नहीं थी, वो लोग 1 अप्रैल को ही न्यू ईयर मनाते रहे, जिस वजह से उन्हें मजाक में 'अप्रैल फूल' कहा जाने लगा। धीरे-धीरे यह परंपरा बन गई, जो लोग पीछे रह जाते, उन्हें झूठ-मजाक में फंसाना और उन्हें 'अप्रैल फूल' कहकर चिढ़ाना। मजेदार बात यह है कि कभी-कभी उन पर कागज की मछली चिपका देते थे। मछली का मतलब था, आसानी से फंसने वाला शिकार।

यही परंपरा धीरे-धीरे यूरोप और फिर बाकी दुनिया में फैल गई। अब यह सिर्फ मजाक का दिन बन गया, जब कोई भी किसी को झूठ-मजाक या हल्के प्रैंक से हंसाने की कोशिश करता है। काम या स्कूल-कॉलेज से छुट्टी न मिले, लेकिन इस दिन का माहौल इतना हल्का और मजेदार होता है कि हर कोई इसका हिस्सा बनना चाहता है।

भारत में अप्रैल फूल्स डे की शुरुआत अंग्रेजों के समय में हुई और अब यह काफी पॉपुलर हो चुका है। दोस्तों के बीच मैसेज भेजकर फंसाना, सोशल मीडिया पर प्रैंक वीडियो डालना, या ऑफिस में हल्के-फुल्के मजाक करना, सब इस दिन के हिस्से हैं।

Source: IANS

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