उत्तराखंड के इस अनोखे मंदिर में हर दिन तीन बार स्वरूप बदलती है देवी की प्रतिमा
उत्तराखंड के इस प्रसिद्ध मंदिर में देवी की प्रतिमा दिन में तीन बार अलग-अलग स्वरूप में दर्शन देती है। जानिए मंदिर का धार्मिक महत्व, पौराणिक मान्यताएं और इस अद्भुत चमत्कार से जुड़ी पूरी जानकारी।

उत्तराखंड, 1 अगस्त । उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों को देवी-देवताओं की निवास स्थली माना जाता है। इसी पावन भूमि पर अल्मोड़ा जिले के शीतलाखेत के समीप प्राचीन और विख्यात शक्तिपीठ मां स्याही देवी मंदिर स्थापित है। पर्वतों के मध्य शांत वातावरण में स्थित इस मंदिर का निर्माण मात्र एक दिन में पूरा किया गया था।
स्थानीय जनश्रुतियों और मान्यताओं के मुताबिक, इस मंदिर में विराजमान माता की प्रतिमा दिनभर में तीन बार अपना रूप परिवर्तित करती है। कत्यूरी शासनकाल के दौरान निर्मित हुए इस मंदिर को अल्मोड़ा के राजाओं की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शनिवार को मंदिर के लिए खास पोस्ट की। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का वीडियो शेयर करते हुए लिखा, "जनपद अल्मोड़ा के शीतलाखेत क्षेत्र में स्थित मां स्याही देवी मंदिर, आदिशक्ति मां भगवती को समर्पित है। इस पावन मंदिर का निर्माण कत्यूरी शासनकाल में किया गया था। रमणीय पर्वतीय वातावरण के बीच माँ का दर्शन आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुपम एहसास कराता है। अल्मोड़ा जनपद आगमन पर आप भी इस पावन मंदिर के दर्शन अवश्य करें।"
कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण केवल एक रात में हुआ था। लोककथाओं के अनुसार, स्थानीय लोगों ने मंदिर के लिए ईंटें तैयार की थीं। तेज बारिश के बावजूद वे ईंटें अगली सुबह पकी हुई मिलीं। मंदिर को जोड़ने में चूने या सीमेंट की जगह बेल और गुड़ के मिश्रण का प्रयोग हुआ, जो आज भी लोगों को अचंभित करता है। स्याही देवी को आसपास के 52 गांवों की इष्ट देवी माना जाता है और उत्तराखंड के अनेक परिवार इन्हें अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं।
यह भी कहा जाता है कि इस मंदिर के बनने से पहले, स्याही देवी की असली मूर्ति लगभग आधा किलोमीटर दूर एक दूसरी पहाड़ी पर स्थापित थी। स्याही देवी को अल्मोड़ा के राजाओं की कुल देवी माना जाता था। इसलिए, राजाओं ने इस जगह पर अपनी देवी के लिए एक नया और बड़ा मंदिर बनवाया।
जब मंदिर बन गया, तो रोज की पूजा-पाठ और मंदिर की देखभाल के लिए नेपाल से गुरु गोरखनाथ के वंशजों को यहां लाया गया। आज भी उसी वंश के लोग इस मंदिर की पूजा और व्यवस्था संभालते हैं। यह भी कहा जाता है कि कत्यूरी राजा बहुत अच्छे कारीगर और शिल्पकार थे, लेकिन वे अपना सारा निर्माण काम सिर्फ रात में ही करते थे। इसी वजह से कहा जाता है कि यह मंदिर भी सिर्फ एक ही रात में बना था।
Source: IANS

