अलास्का वार्ता पर रूस और अमेरिका के दावों में टकराव, लावरोव ने रुबियो के बयान पर उठाए सवाल

मॉस्को, 26 जून । रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा कि अमेरिका यूक्रेन संघर्ष को खत्म करने में आखिर क्या भूमिका निभाना चाहता है, इस बारे में साफ तस्वीर सामने आनी चाहिए। उन्होंने यह बात अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के एंकरेज शिखर सम्मेलन को लेकर दिए गए बयान के बाद कही।

लावरोव ने कहा, "पूरी स्थिति को साफ करना जरूरी है। लेकिन, एक बात तय है कि अलास्का में अमेरिका की ओर से जो प्रस्ताव रखे गए थे, उन्हें रूस ने स्वीकार कर लिया था।"

गुरुवार को मार्को रुबियो ने कहा कि अलास्का के एंकरेज में हुई बैठक के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच यूक्रेन को लेकर कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ था।

बहरीन के दौरे पर पत्रकारों से बात करते हुए रुबियो ने कहा, "अलास्का में कोई समझौता नहीं हुआ था। वहां सिर्फ एक प्रस्ताव रखा गया था। अगर समझौता हो गया होता, तो अब तक युद्ध खत्म हो चुका होता।"

रुबियो का यह बयान लावरोव की उस टिप्पणी के बाद आया, जिसमें उन्होंने कहा था कि अलास्का में यूक्रेन विवाद के समाधान के लिए अमेरिका ने जो प्रस्ताव दिए थे, उन पर अब तक अमेरिका की तरफ से कोई जवाब नहीं आया है।

रूसी न्यूज एजेंसी तास की रिपोर्ट के मुताबिक, 'प्रिमाकोव रीडिंग्स' अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक और विशेषज्ञ सम्मेलन में लावरोव ने कहा कि रूस-अमेरिका शिखर सम्मेलन से पहले अमेरिका ने 'बहुत ही स्पष्ट प्रस्ताव' दिए थे, जिन्हें राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने स्वीकार कर लिया था।

लावरोव ने कहा, "हमें लगा था कि वहां हमारी सहमति बन गई है। लेकिन फिर एक हफ्ता बीत गया, फिर दो हफ्ते। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वॉशिंगटन लौटे और यूरोपीय देशों से सलाह-मशविरा किया। किसी तरह यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की से भी बात की गई। लेकिन आज तक हमें उस अमेरिकी प्रस्ताव पर कोई जवाब नहीं मिला, जिसका हमने समर्थन किया था। अभी स्थिति यही है।"

रूसी विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि अलास्का में जो सहमति बनी थी, वह पहले से ही एक समझौता वाला बीच का रास्ता थी।

लावरोव ने कहा, "जब मेरे सहयोगी मार्को रुबियो कहते हैं कि अलास्का में सिर्फ प्रस्ताव थे, कोई समझौता नहीं हुआ था, तो मेरे मन में सवाल उठता है कि आखिर हम 'समझौता' किसे कह रहे हैं? अगर एक पक्ष, यानी अमेरिका, समाधान के लिए अपने प्रस्ताव सामने रखता है और दूसरा पक्ष, यानी रूस, उन प्रस्तावों को स्वीकार कर लेता है, तो फिर यह कहना कि कोई समझौता नहीं हुआ, ठीक नहीं लगता।"

Source: IANS

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