चीन की आक्रामकता के बीच भारत का ताइवान पर फोकस, आसियान सहयोग से क्षेत्रीय संतुलन की कोशिश

ताइपे, 21 मार्च। मुंबई में एक और ताइपे आर्थिक और सांस्कृतिक केंद्र खोलने और नई दिल्ली में हुए रायसीना डायलॉग में ताइवान के थिंक टैंकों की भागीदारी इस बात का संकेत है कि भारत, ताइवान के साथ अपने संबंधों को और गहरा करना चाहता है।  

‘ताइपे टाइम्स’ की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने अपनी एक्ट ईस्ट नीति के तहत दक्षिण-पूर्व और पूर्व एशियाई देशों के साथ संबंध मजबूत करने में काफी जोर दिया है। इसके चलते इन देशों के साथ भारत के रिश्ते नई ऊंचाई पर पहुंचे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, मोदी ने अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में एक्ट ईस्ट नीति के तहत आसियान देशों के साथ रक्षा और सुरक्षा सहयोग बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान दिया है।रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि भारत को दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ मिलकर ताइवान की भूमिका को क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था, प्रशासन और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों में बढ़ाने पर भी विचार करना चाहिए।

कुआलालंपुर, हनोई और अन्य देशों के साथ भारत का बढ़ता रक्षा सहयोग यह साफ संदेश देता है कि भारत, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और सुरक्षा बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाना चाहता है। 2023 में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) का कुआलालंपुर में पहला क्षेत्रीय कार्यालय खोलना भी इस क्षेत्र में भारत की रक्षा मौजूदगी मजबूत करने के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के ये सक्रिय कदम ताइवान के लिए सकारात्मक हैं। चीन की बढ़ती आक्रामकता का सामना कर रहे ताइवान को भारत की रक्षा कूटनीति से फायदा हो सकता है। इससे दक्षिण चीन सागर और ताइवान जलडमरूमध्य में स्थिरता बढ़ाने का एक संतुलित रास्ता निकल सकता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत सरकार ने 'वन चाइना पॉलिसी' का समर्थन नहीं किया है। सरकार आसियान देशों के साथ सहयोग के नए क्षेत्र बढ़ाने पर ध्यान दे रही है। इसका उद्देश्य रणनीतिक स्वायत्तता की सोच को बढ़ावा देना और क्षेत्र के दूसरे देशों को भी चीन के दबदबे को स्वीकार न करने के लिए समर्थन देना है। रिपोर्ट के अनुसार, ये बदलाव ताइवान के लिए अनुकूल हैं, क्योंकि अब भारत सहित कई क्षेत्रीय शक्तियां अपनी विदेश और सुरक्षा नीतियों में ताइवान के मुद्दे को ज्यादा महत्व दे रही हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अब यह समझ बढ़ रही है कि अगर ताइवान जलडमरूमध्य की मौजूदा स्थिति बिगड़ती है, तो इसका असर कई देशों के समुद्री हितों पर पड़ेगा। साथ ही चीन पड़ोसी देशों पर अपना दबाव और बढ़ा सकता है।

भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को ताइवान को त्रिपक्षीय और बहुपक्षीय मंचों में शामिल करने पर विचार करना चाहिए। इसमें बहुपक्षीय समुद्री अभ्यास भी शामिल हो सकते हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में ताइवान की विशेषज्ञता भारत और आसियान देशों, खासकर चीन की ओर से महत्वपूर्ण ठिकानों पर साइबर हमलों को रोकने में फायदेमंद हो सकती है। नई दिल्ली में हुए एआई इम्पैक्ट समिट में ताइवान का एक प्रतिनिधिमंडल शामिल हुआ था। रिपोर्ट का सुझाव है कि भारत को ताइवान के साथ द्विपक्षीय और बहुपक्षीय स्तर पर सहयोग बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।

Source: IANS

अन्य समाचार

Advertisement

Advertisement

Advertisement

Get Newsletter

Advertisement