'विवेकी और कुशल व्यक्ति को किसी भी विषय के सारतत्व को ग्रहण करना

नई दिल्ली, 8 सितंबर । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर संस्कृत का सुभाषित शेयर किया गया। पीएम की ओर से श्रीमद्भागवतपुराणम् के एकादश स्कंध का अध्याय 8 का 10वां श्लोक साझा किया गया है।

श्रीमद्भागवतपुराणम् के एकादश स्कंध अध्याय 8, श्लोक 10 कहता है, "अणुभ्यश्च महद्भ्यश्च शास्त्रेभ्यः कुशलो नरः। सर्वतः सारमादद्यात् पुष्पेभ्य इव षट्पदः॥" जिसका हिंदी में अर्थ है कि विवेकी और कुशल व्यक्ति को छोटे-बड़े सभी शास्त्रों से, चाहे वे किसी भी विषय के हों, उपयोगी सारतत्व को ग्रहण करना चाहिए। जैसे भौंरा विभिन्न पुष्पों से केवल उनके मधुरस का सार ग्रहण करता है, वैसे ही मनुष्य को भी हर स्रोत से ज्ञान का श्रेष्ठ और उपयोगी अंश आत्मसात करना चाहिए।

'अवधूत गीता' (उद्धव गीता) प्रसंग से है। यहां यदुराज से बात करते हुए अवधूत ब्राह्मण (दत्तात्रेय जी) बताते हैं कि उन्होंने प्रकृति से 24 गुरु बनाए हैं। यह श्लोक उनके 'मधुकर' (भौंरा) गुरु से सीखी गई शिक्षा को दर्शाता है। इस श्लोक के माध्यम से दत्तात्रेय जी बताते हैं कि संसार में ज्ञान का भंडार असीमित है और शास्त्र भी अनगिनत हैं। एक साधारण मनुष्य के लिए सभी शास्त्रों को पूरी तरह पढ़ना और समझना असंभव है। बुद्धिमान व्यक्ति वह है जो ज्ञान के विस्तार में उलझने के बजाय, उसके मुख्य संदेश (सार) को पकड़ लेता है। जैसे भौंरा पूरे पौधे या पत्तों को नहीं ढोता बल्कि सिर्फ फूल का रस लेता है।

दत्तात्रेय जी बताते हैं कि ज्ञान कहीं से भी मिले, चाहे वह कोई बहुत छोटा ग्रंथ हो या कोई महान उपनिषद, चाहे वह कोई साधारण व्यक्ति हो या कोई बड़ा विद्वान, यदि उसमें कोई सत्य या काम की बात है, तो उसे तुरंत स्वीकार कर लेना चाहिए। वे आगे कहते हैं कि कई बार लोग शास्त्रों के कड़े नियमों, व्याकरण और मत-मतांतरों के विवाद में ही उलझकर रह जाते हैं और भगवान की भक्ति या आत्मज्ञान के मूल लक्ष्य को भूल जाते हैं। यह श्लोक सिखाता है कि हमें विवादों को छोड़कर केवल उस ज्ञान पर ध्यान देना चाहिए जो हमारे जीवन को उन्नत बनाए।

Source: IANS

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